NCERT विवाद: शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने ‘कार्रवाई का-पक्का’ वादा किया!

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भारत में एक बड़ा शैक्षिक और संवैधानिक विवाद अचानक से उभर आया है जब सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा 8 की एक NCERT सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक पर पूर्ण प्रतिबंध (ban) लगा दिया, क्योंकि उसमें ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ नामक विषय शामिल था — जिसे न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने वाला बताया गया।

 

और अब इस विवाद का राजनीतिक और प्रशासनिक मोड़ तब आया है जब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आश्वस्त किया कि जिन लोगों की जवाबदेही है, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

 

📘 विवाद की शुरुआत — मामला क्या है?

साल 2026 के शुरू में NCERT ने अपनी सामाजिक विज्ञान की किताब (कक्षा 8) का एक नया संस्करण प्रकाशित किया। इसमें एक अध्याय था जिसका शीर्षक न्यायपालिका में भ्रष्टाचार जैसा कुछ था, और उसमें भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने आने वाली चुनौतियों — जैसे भ्रष्टाचार, लंबित मामलों की भारी संख्या, न्यायधीशों की कमी — का वर्णन था।

 

लेकिन यह खंड ही विवाद की जड़ बन गया।

🔴 सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया:

  • न्यायपालिका से जुड़ी इस सामग्री को “संस्था का अपमान” और दुर्भावनापूर्ण कथन बताया गया।
  • कोर्ट ने पूरी किताब पर प्रतिबंध लगा दिया और सभी प्रतियों को जब्त करने का आदेश दिया।
  • साथ ही शिक्षा सचिव, NCERT निदेशक और संबंधित अधिकारियों को शोह-कॉज़ नोटिस जारी किया गया कि वे बताएं कि उन पर क्यों कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।

 

एक इम्फैटिक टिप्पणी में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी सामग्री    दुर्भावना से भरी गहरी साजिश की तरह दिखती है और “हम इसे. अनुमति नहीं देंगे।”

 

🎙️ धर्मेंद्र प्रधान की प्रतिक्रिया — क्या कहा मंत्री ने?

जब यह विवाद अधिक लोगों तक पहुँचा और सर्वोच्च न्यायालय की नाराज़गी सार्वजनिक रूप से सामने आई, तो केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि:

 

✔️ हताशा और अफसोस:

उन्होंने कहा कि उन्हें इस सामग्री के पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने पर गहरा अफ़सोस है और यह किसी भी तरह से न्यायपालिका का अपमान करने वाली मंशा नहीं थी।

 

✔️ पूर्ण सम्मान:

प्रधान ने जोर देकर कहा कि सरकार और शिक्षण निकायों का न्यायपालिका के प्रति पूरा सम्मान है और कोई भी संस्थान या व्यक्ति इसका अपमान नहीं करना चाहता।

 

✔️ कार्रवाई का आश्वासन:

उन्होंने आश्वस्त किया कि जिन व्यक्तियों ने उस विवादित अध्याय को तैयार और प्रकाशित किया, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी, और जवाबदेही सुनिश्चित की जाएगी।

 

🔍 जांच की बात:

प्रशासनिक समीक्षा और एकत्र जानकारी के आधार पर पूरी जांच की जाएगी कि यह अध्याय कैसे अंतिम पाठ्यक्रम में शामिल हो गया, और जिम्मेदारों की पहचान कर उन्हें दण्ड देने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।

 

📉 क्यों यह बड़ा सवाल बन गया?

यह मामला सिर्फ पढ़ाई के साहित्य तक सीमित नहीं रहा — यह भारतीय संविधान, न्यायपालिका और शिक्षा नीति के बीच संवेदनशील सामंजस्य पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है।

🔸 क्या छात्रों को किसी संवैधानिक संस्था की आलोचना करने वाले तथ्य या विचार पढ़ाना चाहिए?

🔸 सामाजिक विज्ञान में आलोचनात्मक सोच कौन तय करता है — विशेषज्ञ या अदालतें?

🔸 और क्या किसी संस्था के सामने प्रतिष्ठा और आलोचना के बीच कोई सीमा होनी चाहिए?

इन सभी प्रश्नों पर सार्वजनिक बहस, राजनीतिक टिप्पणी और सामाजिक चिंतन जारी है।

 

🚨 राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया

इस विवाद पर सिर्फ कोर्ट और शिक्षा मंत्रालय ही नहीं बोले — राजनीतिक पार्टियाँ और विभिन्न समूहों ने भी अपनी राय व्यक्त की है। कुछ लोगों ने पूछा कि क्या स्कूल-स्तर पर संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना जटिल हो सकती है, जबकि दूसरे समुदाय इसे जरूरी सीख मानते हैं।

 

🧠 📍 NCERT की कक्षा 8 की किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार नामक विषय विवाद का केंद्र बना।

📍 सुप्रीम कोर्ट ने किताब पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया और सभी प्रतियाँ जब्त करने को कहा।

📍 धर्मेंद्र प्रधान ने कार्रवाई का भरोसा दिया और जिम्मेदारी तय करने की बात कही।

📍 और यह विवाद शिक्षा-सत्ता-न्यायपालिका के बीच संवेदनशील संतुलन पर एक बड़ा सार्वजनिक संवाद बन चुका है।