ईरान–अमेरिका तनाव: युद्ध की आहट के बीच अमेरिका पर बढ़ता अरबों डॉलर का खर्च

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Iran US Tensions: Rising conflict in the Middle East could push US war spending to billions of dollars as global concerns increase.

4 मार्च:

मध्य पूर्व में एक बार फिर तनाव का माहौल गहरा गया है। ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ते टकराव ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को चिंतित कर दिया है। पिछले कुछ दिनों में दोनों देशों के बीच लगातार हमले और जवाबी कार्रवाई की घटनाओं ने पूरे क्षेत्र को युद्ध के कगार पर पहुंचा दिया है। इस संघर्ष में इज़राइल के प्रमुख सहयोगी के रूप में अमेरिका खुलकर उसके समर्थन में खड़ा दिखाई दे रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह टकराव लंबे समय तक जारी रहा, तो इसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

संघर्ष की पृष्ठभूमि

ईरान और इज़राइल के बीच लंबे समय से तनावपूर्ण संबंध रहे हैं। दोनों देशों के बीच राजनीतिक, सैन्य और वैचारिक मतभेद लगातार बढ़ते रहे हैं। हाल के दिनों में यह तनाव और बढ़ गया, जब दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर कई हमले किए।

रिपोर्टों के अनुसार, इज़राइल ने ईरान से जुड़े कुछ सैन्य ठिकानों और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाकर हवाई हमले किए। इन हमलों में ईरान के कुछ वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों और नेताओं के मारे जाने की खबरें सामने आई हैं। इन घटनाओं के बाद क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया।

अमेरिका का इज़राइल के पक्ष में हस्तक्षेप

इज़राइल के करीबी सहयोगी के रूप में अमेरिका ने इस संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अमेरिका ने इज़राइल की सुरक्षा के लिए समर्थन देने के साथ-साथ ईरान से जुड़े कई लक्ष्यों पर हमले किए हैं।

अमेरिका का कहना है कि उसका उद्देश्य क्षेत्र में अपने सहयोगियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और संभावित खतरों को रोकना है। लेकिन इस कदम से संघर्ष और ज्यादा गंभीर हो गया है।

ईरान की जवाबी कार्रवाई

इज़राइल और अमेरिका की कार्रवाइयों के बाद ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी है। विभिन्न रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान ने मध्य पूर्व के कई क्षेत्रों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिश की है।

विशेष रूप से संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और अन्य क्षेत्रों में स्थित अमेरिकी एयरबेस को संभावित लक्ष्य बताया जा रहा है। इन हमलों के कारण अमेरिकी सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुंचने की खबरें भी सामने आई हैं। हालांकि इन घटनाओं की आधिकारिक पुष्टि अभी पूरी तरह से नहीं हुई है।

ट्रंप की प्रतिक्रिया

इस पूरे घटनाक्रम पर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि यदि ईरान अब पीछे हटने की कोशिश करता है तो भी शायद बहुत देर हो चुकी है।

ट्रंप के इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के बयान तनाव को और बढ़ा सकते हैं।

युद्ध की कीमत: अमेरिका पर बढ़ता आर्थिक दबाव

ईरान के साथ बढ़ते संघर्ष के कारण अमेरिका पर भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है। सैन्य अभियान, हथियारों की तैनाती, युद्धपोतों की गतिविधियां और सैनिकों की तैनाती जैसे कई खर्च तेजी से बढ़ रहे हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, युद्ध की शुरुआत के पहले 24 घंटों में ही अमेरिका ने लगभग 779 मिलियन डॉलर खर्च कर दिए। भारतीय मुद्रा में यह राशि करीब 6,900 करोड़ रुपये के बराबर बताई जा रही है।

सैन्य संसाधनों की तैनाती

सेंटर फॉर न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी के आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका ने अपने शक्तिशाली विमानवाहक पोत और युद्धपोतों को भी इस क्षेत्र में तैनात किया है।

इनमें यूएसएस जेराल्ड आर. फोर्ड जैसे कैरियर स्ट्राइक ग्रुप भी शामिल हैं। इन विशाल सैन्य जहाजों को संचालित करने में हर दिन भारी खर्च आता है।

सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार, केवल एक कैरियर स्ट्राइक ग्रुप को संचालित करने में प्रतिदिन करोड़ों रुपये खर्च हो सकते हैं।

सैन्य उपकरणों की तैनाती पर भारी खर्च

रिपोर्टों के अनुसार, युद्ध की तैयारी और सैन्य संसाधनों की तैनाती पर अमेरिका ने पहले ही भारी राशि खर्च कर दी है।

केवल एयरक्राफ्ट, युद्धपोत और अन्य सैन्य उपकरणों की तैनाती पर ही अमेरिका ने लगभग 630 मिलियन डॉलर खर्च किए हैं। भारतीय मुद्रा में यह लगभग 5,556 करोड़ रुपये के बराबर है।

कुल खर्च 210 बिलियन डॉलर तक पहुंचने की संभावना

पेन व्हार्टन बजट मॉडल के निदेशक केंट स्मेटर्स के अनुमान के अनुसार यदि यह संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है तो अमेरिका का कुल सैन्य खर्च 210 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है।

भारतीय मुद्रा में यह लगभग 18.87 लाख करोड़ रुपये के बराबर होगा। यह राशि कई देशों के वार्षिक बजट के बराबर मानी जा सकती है।

इज़राइल को अमेरिका की आर्थिक सहायता

इसी बीच अमेरिका अपने सहयोगी देश इज़राइल को आर्थिक सहायता भी प्रदान कर रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, 2023 में ही अमेरिका ने इज़राइल को लगभग 21.7 बिलियन डॉलर की आर्थिक मदद दी थी।

इस सहायता का उद्देश्य इज़राइल को हमास के साथ हुए संघर्ष से हुए नुकसान की भरपाई करने और उसकी सैन्य क्षमताओं को मजबूत करना है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संभावित असर

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच यह संघर्ष और बढ़ता है, तो इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

मध्य पूर्व दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल उत्पादक क्षेत्रों में से एक है। यदि यहां युद्ध की स्थिति पैदा होती है, तो तेल की कीमतों में भारी वृद्धि हो सकती है। इससे दुनिया भर में महंगाई और आर्थिक अस्थिरता बढ़ने की आशंका है।

आगे क्या होगा?

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में हालात किस दिशा में जाते हैं। कई देश इस संघर्ष को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने की अपील कर रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र सहित कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी दोनों पक्षों से संयम बरतने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है।

हालांकि मौजूदा हालात को देखते हुए यह कहना मुश्किल है कि यह तनाव जल्द खत्म होगा या आने वाले समय में और गंभीर रूप ले सकता है।

दुनिया फिलहाल इस संघर्ष के अगले कदम का इंतजार कर रही है।