डोल पूर्णिमा 2026: बेलूर मठ से देशभर तक गूंजी होलिका दहन की आस्था

1000174113

1000174113



डोल पूर्णिमा पर होलिका दहन: बेलूर मठ से देशभर तक आस्था की ज्वाला


डोल के दिन आस्था की अग्नि: बेलूर मठ से लेकर देशभर में गूंजा होलिका दहन

पश्चिम बंगाल में दिखी आस्था की अद्भुत तस्वीर, बेलूर मठ में स्वामीजी हुए शामिल

आज डोल पूर्णिमा के पावन अवसर पर पूरे पश्चिम बंगाल में भक्तिमय और रंगों से सराबोर माहौल देखने को मिला।
राज्य के विभिन्न जिलों में होलिका दहन की मनमोहक तस्वीरें सामने आईं।
इसी बीच एक विशेष दृश्य कोलकाता के पास स्थित
Ramakrishna Math and Mission
के मुख्यालय Belur Math से देखने को मिला,
जहाँ स्वामीजी ने श्रद्धालुओं के साथ होलिका दहन में भाग लिया।

बेलूर मठ का वातावरण भक्ति, शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत दिखाई दिया।
वेद मंत्रों के उच्चारण और शंखध्वनि के बीच अग्नि प्रज्वलित की गई, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।

FB IMG 1772477644078


होलिका दहन की पौराणिक कथा

होलिका दहन की परंपरा हिंदू पौराणिक कथा से जुड़ी है। कथा के अनुसार असुर राजा
Hiranyakashipu
अपने अहंकार में इतना डूब गया था कि वह स्वयं को ईश्वर मानने लगा और सभी से अपनी पूजा करवाने लगा।
लेकिन उसका पुत्र Prahlada
भगवान विष्णु का परम भक्त था।

पुत्र की भक्ति से क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु ने उसे कई बार मारने की कोशिश की। अंततः उसने अपनी बहन
Holika
की सहायता ली, जिसे अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त था।
योजना के तहत होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई।
लेकिन दैवी कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गए और होलिका अग्नि में भस्म हो गई।

यह घटना बुराई पर अच्छाई, अहंकार पर भक्ति और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक बन गई।
इसी स्मृति में हर वर्ष फाल्गुन पूर्णिमा की रात होलिका दहन किया जाता है।


ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि

इतिहासकारों के अनुसार होलिका दहन केवल पौराणिक कथा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह
ऋतु परिवर्तन और कृषि संस्कृति से भी जुड़ा हुआ है।
प्राचीन भारत में इस समय नई फसल की कटाई होती थी और किसान अग्नि प्रज्वलित कर
प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करते थे।

FB IMG 1772477640178

वसंत ऋतु के आगमन पर यह उत्सव समाज में नव ऊर्जा, उल्लास और भाईचारे का संदेश देता है।
डोल पूर्णिमा विशेष रूप से पश्चिम बंगाल और ओडिशा में मनाई जाती है, जहाँ इसे
‘डोल जात्रा’ के रूप में भी जाना जाता है।


पश्चिम बंगाल में डोल और होलिका दहन

पश्चिम बंगाल में डोल का उत्सव विशेष महत्व रखता है।
ग्रामीण इलाकों से लेकर महानगर कोलकाता तक, हर जगह भजन-कीर्तन और रंगों की धूम रहती है।

विशेष रूप से Belur Math में
आध्यात्मिक माहौल के बीच होलिका दहन ने भक्तों को एक अलग ही अनुभूति दी।
साधु-संतों और श्रद्धालुओं ने मिलकर प्रार्थना की और समाज में शांति एवं सद्भाव की कामना की।


देशभर में उत्सव की झलक

उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र सहित देश के विभिन्न हिस्सों में
होलिका दहन पूरे विधि-विधान से संपन्न हुआ।
कहीं लोकगीत गाए गए, कहीं ढोल-नगाड़ों की गूंज सुनाई दी, तो कहीं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हुआ।

ग्रामीण भारत में आज भी लोग अपने मोहल्लों और गाँवों में लकड़ियाँ इकट्ठा कर सामूहिक रूप से
अग्नि प्रज्वलित करते हैं और एक-दूसरे को बधाई देते हैं।
यह पर्व सामाजिक एकता और आपसी भाईचारे का प्रतीक बन चुका है।


आस्था और एकता का संदेश

डोल पूर्णिमा और होलिका दहन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक
एकता के प्रतीक हैं।
बेलूर मठ की तस्वीरों ने यह संदेश दिया कि आध्यात्मिक संस्थान भी समाज को
सकारात्मक ऊर्जा और नैतिक मूल्यों की प्रेरणा दे रहे हैं।

आज जब समाज अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है, तब होलिका दहन हमें याद दिलाता है कि
सत्य, भक्ति और सदाचार की अग्नि हर बुराई को भस्म कर सकती है।

बुराई की होली जले, प्रेम और सद्भाव के रंग खिलें — यही है होलिका दहन का सच्चा संदेश।