उत्सव के बाहर सूने सिनेमा हॉल: सालभर बंगाली फिल्मों की मांग तेज

1000173787

1000173787



उत्सव के बाहर सूने सिनेमा हॉल: बंगाली फिल्मों को सालभर चाहिए रफ्तार

उत्सव के बाहर सूने सिनेमा हॉल: बंगाली फिल्मों को सालभर चाहिए रफ्तार

हॉल मालिकों की मांग – सुपरस्टार और निर्माता पूरे साल फिल्में बनाएं, तभी लौटेगी दर्शकों की भीड़

पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा, ईद या क्रिसमस जैसे बड़े त्योहारों के समय सिनेमा हॉल के बाहर लंबी कतारें दिखना आम बात है। लेकिन जैसे ही उत्सव का मौसम खत्म होता है, हॉलों में सन्नाटा पसर जाता है। बंगाली फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कई हॉल मालिकों का कहना है कि यह स्थिति अब चिंता का विषय बन चुकी है। उनका साफ कहना है – अगर सुपरस्टार और निर्माता सालभर लगातार फिल्में रिलीज़ करें, तो दर्शकों की आदत बनेगी और कारोबार भी मजबूत होगा।

कोलकाता और जिलों के कई सिंगल-स्क्रीन हॉल मालिकों का दावा है कि आज स्थिति यह है कि त्योहारों के अलावा अच्छी बंगाली फिल्में बहुत कम रिलीज़ होती हैं। नतीजा यह होता है कि दर्शक या तो ओटीटी प्लेटफॉर्म की ओर रुख कर लेते हैं या फिर हिंदी और दक्षिण भारतीय फिल्मों को प्राथमिकता देते हैं।

सिर्फ त्योहारों पर निर्भर क्यों?

बंगाली सिनेमा में लंबे समय से यह ट्रेंड देखा जा रहा है कि बड़े बजट और सुपरस्टार वाली फिल्में मुख्य रूप से पूजा या बड़े त्योहारों के समय रिलीज़ की जाती हैं। निर्माता मानते हैं कि उस समय पारिवारिक दर्शक बड़ी संख्या में सिनेमाघरों का रुख करते हैं, जिससे कलेक्शन बेहतर होता है।

लेकिन हॉल मालिकों का तर्क है कि यह सोच अब बदलनी होगी। उनका कहना है कि अगर साल के बाकी महीनों में भी अच्छी स्क्रिप्ट, मजबूत प्रचार और लोकप्रिय कलाकारों के साथ फिल्में आएंगी, तो दर्शकों की सिनेमाघर आने की आदत बनेगी। लगातार कंटेंट मिलने से बाजार में स्थिरता आएगी।

व्यवसाय पर पड़ रहा असर

त्योहारों के अलावा जब हॉल खाली रहते हैं, तो बिजली, स्टाफ सैलरी और रखरखाव का खर्च निकालना मुश्किल हो जाता है। कई छोटे शहरों के सिनेमाघर बंद होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। हॉल मालिकों का कहना है कि अगर स्थिति ऐसी ही रही, तो आने वाले समय में कई सिंगल-स्क्रीन हॉल इतिहास बन जाएंगे।

उनका मानना है कि बंगाली सिनेमा की समृद्ध परंपरा रही है। ऐसे में अगर निर्माता सालभर नियमित रूप से फिल्में बनाएं और रिलीज़ करें, तो न सिर्फ दर्शकों का भरोसा लौटेगा बल्कि थिएटर व्यवसाय भी स्थायी रूप से मजबूत होगा।

दर्शकों की भी है जिम्मेदारी

सिर्फ निर्माता ही नहीं, दर्शकों की भी इसमें अहम भूमिका है। अगर अच्छी फिल्में सालभर आती हैं, तो दर्शकों को भी सिनेमाघरों में जाकर उन्हें समर्थन देना होगा। ओटीटी की सुविधा ने लोगों को घर बैठे मनोरंजन का विकल्प दे दिया है, लेकिन बड़े पर्दे का अनुभव आज भी अलग और खास है।

फिल्म समीक्षकों का कहना है कि कंटेंट में विविधता लाने की जरूरत है। सिर्फ एक्शन या पारिवारिक ड्रामा ही नहीं, बल्कि युवाओं, महिलाओं और बच्चों को ध्यान में रखकर भी फिल्में बननी चाहिए। इससे अलग-अलग वर्ग के दर्शक सिनेमाघरों तक खिंचे चले आएंगे।

सरकार और इंडस्ट्री को मिलकर उठाने होंगे कदम

विशेषज्ञों का सुझाव है कि राज्य सरकार और फिल्म इंडस्ट्री को मिलकर ऐसी नीतियां बनानी चाहिए, जिससे छोटे निर्माताओं को भी प्रोत्साहन मिले। टैक्स में राहत, प्रचार में सहयोग और फिल्म महोत्सव जैसे आयोजनों से सालभर सिनेमाघरों में हलचल बनी रह सकती है।

अगर सुपरस्टार कलाकार साल में सिर्फ एक फिल्म करने की बजाय दो या तीन फिल्मों में काम करें, तो रिलीज़ कैलेंडर संतुलित रहेगा। इससे दर्शकों की उम्मीद भी बनी रहेगी और थिएटर व्यवसाय में निरंतरता आएगी।

भविष्य की राह

बंगाली फिल्म इंडस्ट्री के सामने चुनौती जरूर है, लेकिन अवसर भी कम नहीं हैं। मजबूत कहानी, तकनीकी गुणवत्ता और नियमित रिलीज़ रणनीति के जरिए सिनेमाघरों को फिर से जीवंत बनाया जा सकता है।

हॉल मालिकों की मांग साफ है – “सालभर फिल्में बनाइए, दर्शकों को विकल्प दीजिए और सिनेमा संस्कृति को जिंदा रखिए।” अगर निर्माता, कलाकार और दर्शक मिलकर इस दिशा में कदम बढ़ाते हैं, तो निश्चित ही बंगाली सिनेमा का सुनहरा दौर फिर लौट सकता है।

अब सवाल यह है कि क्या इंडस्ट्री इस चुनौती को अवसर में बदल पाएगी? जवाब आने वाला समय ही देगा, लेकिन उम्मीद की किरण अभी भी बाकी है।