कांग्रेस ने CBSE के तीन-भाषा फॉर्मूले में ‘यू-टर्न’ पर मोदी सरकार की आलोचना की

Congress slams Modi govt. over CBSE’s ‘U-turn’ on three-language formula

नयी दिल्ली, भारत

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के महासचिव जयराम रमेश ने हाल ही में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पर तगड़ी हमला बोला है। उन्होंने शिक्षा मंत्री से त्वरित इस्तीफे की मांग करते हुए कहा है कि सीबीएसई द्वारा तीन-भाषा फॉर्मूले में की गई ‘यू-टर्न’ एक बड़ी विफलता है, जो देश की बहुभाषी नीति और राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा बन सकती है।

जयराम रमेश ने अपने बयान में कहा कि तीन-भाषा फॉर्मूला भारत के शिक्षा तंत्र की रीढ़ है। यह वह नीति है, जिसके माध्यम से विद्यार्थी राष्ट्र की अलग-अलग भाषाओं से परिचित होते हैं और यह राष्ट्रीय एकता को मजबूत बनाता है। लेकिन सीबीएसई का हालिया परिवर्तन, जिसमें इस फॉर्मूले को कमजोर करने का प्रयास किया गया है, चिंता का विषय है। यह केवल शैक्षिक स्तर पर ही नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी देश के व्यापक हितों के खिलाफ है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि धर्मेंद्र प्रधान को तत्काल प्रभाव से अपनी जिम्मेदारियों से हट जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि शिक्षा मंत्रालय ने बिना किसी व्यापक चर्चा और विशेषज्ञों की सलाह के इस निर्णय को लागू किया है, जिससे विद्यार्थियों और शिक्षकों दोनों में बड़ी नाराजगी पनप रही है।

इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा तेज हो गई है। विपक्षी दल इस मुद्दे को लेकर मोदी सरकार के खिलाफ आक्रामक मोड में दिख रहे हैं। कांग्रेस ने इसे शिक्षा क्षेत्र में बड़ी त्रुटि बताते हुए कहा कि यह ध्रुवीकरण को बढ़ावा देगा और अलग-अलग भाषाई समुदायों के बीच दूरी बढ़ाएगा।

शिक्षा विशेषज्ञों की मानें तो तीन-भाषा फॉर्मूला निश्चित रूप से विद्यार्थियों के सामंजस्यपूर्ण विकास के लिए जरूरी है। इसे कमजोर करने से न केवल उनके भाषाई कौशल पर प्रभाव पड़ेगा, बल्कि भारत की बहुभाषी विरासत भी प्रभावित होगी। कुछ शिक्षाविदों का यह भी मत है कि सरकार को इस तरह के निर्णय सामाजिक और शैक्षिक प्रभावों की गहन समीक्षा के बाद ही लेना चाहिए।

हालांकि, केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने अब तक इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। लेकिन कांग्रेस की मांग और जनता की चिंता को देखते हुए सरकार पर दबाव बढ़ रहा है कि वह इस फैसले पर पुनर्विचार करे।

इस पूरे प्रकरण ने शिक्षा नीति के सार्वजनिक संवाद को मजबूती से उभारने की आवश्यकता को दर्शाया है। वहीं, भविष्य में तीन-भाषा फॉर्मूले को लेकर चल रही बहस को ध्यान में रखते हुए, नीति निर्माण में अधिक पारदर्शिता, व्यापक सलाह और सहभागिता को महत्व दिया जाना चाहिए ताकि सभी हितधारकों की आवाज़ सुनी जा सके।

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