
कोलकाता के स्कूलों के मिड-डे मील पर विवाद: बिना टेंडर ISKCON को जिम्मेदारी देने के खिलाफ हाई कोर्ट पहुंचा कर्मचारी यूनियन
कोलकाता: पश्चिम बंगाल में सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के मिड-डे मील (PM POSHAN) को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। कोलकाता नगर निगम क्षेत्र के स्कूलों में मिड-डे मील की आपूर्ति का जिम्मा ISKCON की अन्नामृत फूड रिलीफ फाउंडेशन को सौंपे जाने के खिलाफ पश्चिम बंगाल मिड-डे मील कर्मचारी यूनियन ने कलकत्ता हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। यूनियन का आरोप है कि सरकार ने बिना किसी टेंडर प्रक्रिया के सीधे एक निजी संस्था को यह जिम्मेदारी देकर नियमों का उल्लंघन किया है।
क्या है पूरा मामला?
राज्य में नई सरकार बनने के बाद अपने पहले बजट में यह घोषणा की गई थी कि कोलकाता नगर निगम क्षेत्र के सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में मिड-डे मील के तहत पका हुआ भोजन ISKCON की अन्नामृत फूड रिलीफ फाउंडेशन उपलब्ध कराएगी। सरकार ने इसे एक पायलट प्रोजेक्ट बताया था। यदि यह सफल रहता है, तो भविष्य में इस मॉडल को पूरे राज्य में लागू करने पर विचार किया जा सकता है।
सरकार का कहना है कि इस व्यवस्था से छात्रों को समय पर गुणवत्तापूर्ण, पौष्टिक और स्वच्छ भोजन उपलब्ध कराया जा सकेगा। साथ ही भोजन की गुणवत्ता और वितरण प्रणाली में भी सुधार होगा।
पहले भी दायर हुई थी जनहित याचिका
इस सरकारी घोषणा के खिलाफ सबसे पहले अधिवक्ता शीर्षण्य बंद्योपाध्याय ने कलकत्ता हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। 8 जुलाई को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तपोब्रत चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति पार्थसारथी चट्टोपाध्याय की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की थी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया था कि केवल मुख्यमंत्री की सार्वजनिक घोषणा के आधार पर न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता। अदालत ने यह भी कहा कि उस समय तक सरकार की ओर से कोई आधिकारिक अधिसूचना या औपचारिक आदेश प्रस्तुत नहीं किया गया था, जिससे यह साबित हो कि ISKCON को आधिकारिक रूप से यह जिम्मेदारी दी गई है।
हालांकि, अदालत ने राज्य सरकार से यह भी पूछा था कि क्या इस संबंध में कोई निर्णय लागू किया गया है या नहीं। इस पर सरकार को हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया था।
15 जुलाई को जारी हुआ आदेश
बाद में राज्य सरकार ने 15 जुलाई को आधिकारिक रूप से कोलकाता नगर निगम क्षेत्र के सरकारी एवं सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में पका हुआ भोजन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी ISKCON की अन्नामृत फूड रिलीफ फाउंडेशन को सौंप दी। सरकार ने यह भी घोषणा की कि यह नई व्यवस्था 1 अगस्त से लागू होगी और स्कूलों में बच्चों को इसी संस्था के माध्यम से भोजन उपलब्ध कराया जाएगा।
इस सरकारी आदेश के बाद मामला और अधिक विवादित हो गया।
कर्मचारी यूनियन ने उठाया टेंडर का मुद्दा
30 जुलाई को पश्चिम बंगाल मिड-डे मील कर्मचारी यूनियन ने हाई कोर्ट में नई याचिका दायर की। यूनियन की ओर से अधिवक्ता ऋतंकर दास ने अदालत में कहा कि इतनी बड़ी सार्वजनिक परियोजना किसी संस्था को सौंपने से पहले पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी। बिना निविदा के किसी निजी संस्था को जिम्मेदारी देना सरकारी नियमों और पारदर्शिता के सिद्धांतों के खिलाफ है।
यूनियन का यह भी कहना है कि इस फैसले से वर्षों से मिड-डे मील योजना में काम कर रहे हजारों रसोइयों, सहायकों और कर्मचारियों के भविष्य पर असर पड़ सकता है। इसलिए सरकार को पहले सभी हितधारकों से चर्चा करनी चाहिए थी।
हाई कोर्ट ने दोनों मामलों को जोड़ा
शुक्रवार को न्यायमूर्ति कृष्ण राव की अदालत में इस नई याचिका पर सुनवाई हुई। अदालत ने कर्मचारी यूनियन की याचिका को पहले से लंबित जनहित याचिका के साथ जोड़ने का आदेश दिया। अब दोनों मामलों की संयुक्त सुनवाई अगस्त महीने में होगी।
अदालत में होने वाली अगली सुनवाई पर सभी पक्षों की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि इससे यह तय हो सकता है कि ISKCON को दी गई जिम्मेदारी कानूनी रूप से वैध है या नहीं।
यूनियन ने क्या कहा?
पश्चिम बंगाल मिड-डे मील कर्मचारी यूनियन की महासचिव मधुमिता बंद्योपाध्याय ने कहा कि बिना टेंडर किसी संस्था को जिम्मेदारी देना पूरी तरह अनुचित और अवैध है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक धन से संचालित किसी भी सरकारी योजना में पारदर्शिता सर्वोपरि होनी चाहिए। यूनियन इस फैसले के खिलाफ कानूनी लड़ाई जारी रखेगी और उसे उम्मीद है कि अदालत उनके पक्ष में फैसला देगी।
सरकार की दलील
राज्य सरकार का मानना है कि इस नई व्यवस्था से छात्रों को बेहतर गुणवत्ता का भोजन मिलेगा और मिड-डे मील योजना को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा। सरकार का दावा है कि यह केवल एक पायलट प्रोजेक्ट है और इसके परिणामों के आधार पर आगे की नीति तय की जाएगी।
अब सबकी नजर अदालत पर
फिलहाल 1 अगस्त से नई व्यवस्था लागू करने की तैयारी पूरी कर ली गई है। दूसरी ओर, कर्मचारी संगठनों और विपक्ष की आपत्तियों के कारण यह मामला कानूनी रूप से महत्वपूर्ण बन गया है। अगस्त में हाई कोर्ट की अगली सुनवाई से यह स्पष्ट हो सकेगा कि बिना टेंडर ISKCON को मिड-डे मील की जिम्मेदारी सौंपने का फैसला कानून और सरकारी प्रक्रियाओं के अनुरूप था या नहीं।
