सीपीएम में बड़ा विवाद आंतरिक मतभेद पर बढ़ा टकराव

सीपीएम में अंदरूनी विवाद तेज, पार्टी नेतृत्व पर बयान को लेकर प्रतिकुर पर कार्रवाई की संभावना

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कोलकाता: पश्चिम बंगाल की वाम राजनीति में इन दिनों अंदरूनी मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी सीपीएम के एक युवा नेता प्रतिकुर के हालिया बयानों को लेकर पार्टी के भीतर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। (CPIM Alimuddin Controversy highlights party crisis.)पार्टी सूत्रों के अनुसार, कोलकाता स्थित अलीमुद्दीन स्ट्रीट स्थित पार्टी मुख्यालय में चल रही राज्य कमेटी की बैठक में उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई पर गंभीर चर्चा हुई है। संभावना जताई जा रही है कि पार्टी नेतृत्व इस विवाद पर अंतिम निर्णय लेते हुए उन्हें निष्कासित कर सकता है।

राज्य कमेटी की बैठक में उठा मुद्दा

सीपीएम की दो दिवसीय राज्य कमेटी बैठक गुरुवार से शुरू हुई, जिसमें कई वरिष्ठ सदस्यों ने प्रतिकुर द्वारा मीडिया में दिए गए लगातार बयानों पर सवाल उठाए। पार्टी के कई नेताओं ने इसे संगठनात्मक अनुशासन के खिलाफ बताते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग की है। बताया जा रहा है कि पार्टी के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम भी अपने जवाबी भाषण में इस मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट कर सकते हैं। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि सार्वजनिक मंचों पर संगठन की आलोचना से कार्यकर्ताओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा होती है और पार्टी की छवि प्रभावित होती है।

मीडिया में दिए गए बयानों से बढ़ा विवाद

बैठक के दौरान ही प्रतिकुर ने विभिन्न समाचार माध्यमों को कई इंटरव्यू दिए, जिनमें उन्होंने पार्टी नेतृत्व और नीतियों की खुलकर आलोचना की। उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की कुछ योजनाओं और उनके राजनीतिक रुख की भी सराहना की, जिससे विवाद और गहरा गया।

प्रतिकुर ने राज्य सरकार की सामाजिक कल्याण योजना ‘लक्ष्मी भंडार’ को गरीबों के सम्मान से जुड़ा कदम बताया। उन्होंने कहा कि पहले वामपंथी इसे सहायता या दान मानते थे, लेकिन अब यह गरीबों को अधिकार और आत्मसम्मान देने की पहल है। उनके अनुसार, जब कोई राजनीतिक दल जनता से दूर हो जाता है, तब इस तरह की स्थिति उत्पन्न होती है।

नीतिगत मुद्दों पर अलग राय

युवा नेता ने उर्वरक यानी ‘सार’ से जुड़े मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस के संघर्ष की प्रशंसा करते हुए कहा कि इस मामले में राज्य सरकार ने सक्रिय भूमिका निभाई है। उन्होंने मुख्यमंत्री द्वारा सुप्रीम कोर्ट में जाकर लड़ाई लड़ने को महत्वपूर्ण कदम बताया और कहा कि अन्य राज्यों के नेताओं को भी इसी तरह सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए थी।

प्रतिकुर ने आरोप लगाया कि पार्टी के कुछ नेता जमीनी स्तर पर संघर्ष करने के बजाय केवल सैद्धांतिक चर्चा तक सीमित रहते हैं और आम लोगों की समस्याओं से दूर हो गए हैं।

पार्टी की ओर से जवाब

प्रतिकुर के आरोपों का जवाब देते हुए सीपीएम के राज्य कमेटी सदस्य शतरूप घोष ने कहा कि पार्टी कार्यकर्ताओं ने कई महत्वपूर्ण मामलों में अदालत का दरवाजा खटखटाया है और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर लगातार संघर्ष किया है। नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ भी वामपंथी नेतृत्व ने अदालत में सक्रिय भूमिका निभाई है।

राज्य सचिव पर भी सवाल

प्रतिकुर ने पार्टी के राज्य सचिव की भूमिका पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि जब उन्होंने पार्टी सदस्यता से इस्तीफा दिया, तब नेतृत्व की ओर से कोई संवाद नहीं हुआ। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी के भीतर भय और दबाव का वातावरण बन गया है, जिससे कार्यकर्ता खुलकर अपनी बात नहीं रख पा रहे हैं।

अन्य नेताओं को लेकर चर्चा

इस विवाद के बीच पार्टी की एक अन्य युवा नेता दीप्तिसिता धर को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। उनके पार्टी सदस्यता नवीनीकरण को लेकर सवाल उठाए गए। उन्होंने स्पष्ट किया कि सदस्यता से जुड़े मुद्दे पार्टी का आंतरिक मामला हैं और इसे सार्वजनिक बहस का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए।

राजनीतिक असर

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस घटनाक्रम से पश्चिम बंगाल में वामपंथी राजनीति के सामने मौजूद चुनौतियां उजागर हुई हैं। एक ओर पार्टी संगठन को मजबूत करने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर अंदरूनी मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने आ रहे हैं। फिलहाल सभी की नजर राज्य कमेटी बैठक के अंतिम निर्णय पर टिकी हुई है।