
Prime Minister Narendra Modi Meets Malayali Litterateurs, Express Gratitude Over Renaming of ‘Kerala’ to ‘Keralam’
प्रधानमंत्री Narendra Modi से मिले मलयाली साहित्यकार, ‘केरल’ से ‘केरलम’ नामकरण पर जताया आभार
नई दिल्ली: देश की सांस्कृतिक पहचान और भाषाई अस्मिता को लेकर एक अहम और भावनात्मक मुलाकात उस समय देखने को मिली, जब प्रधानमंत्री Narendra Modi ने प्रतिष्ठित मलयाली साहित्यकारों के एक प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की। इस दौरान साहित्यकारों ने राज्य के नाम को ‘केरल’ से बदलकर ‘केरलम’ किए जाने के निर्णय पर प्रधानमंत्री का आभार व्यक्त किया।
प्रधानमंत्री ने इस संवाद को “अत्यंत ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायक” बताया और कहा कि यह मुलाकात मलयालम भाषा और ‘केरलम’ की सांस्कृतिक विरासत के प्रति गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
भाषाई पहचान और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक
प्रतिनिधिमंडल में शामिल साहित्यकारों ने कहा कि ‘केरलम’ नाम केवल एक शब्द परिवर्तन नहीं, बल्कि राज्य की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा भावनात्मक मुद्दा है। उनका मानना है कि ‘केरलम’ नाम मलयालम भाषा की आत्मा के अधिक निकट है और यह स्थानीय उच्चारण व परंपरा को सटीक रूप से अभिव्यक्त करता है।
साहित्यकारों ने प्रधानमंत्री को बताया कि लंबे समय से बुद्धिजीवी वर्ग और सांस्कृतिक संगठनों के बीच यह मांग उठती रही है कि राज्य का आधिकारिक नाम ‘केरलम’ किया जाए, ताकि वैश्विक मंच पर भी इसकी असली पहचान स्थापित हो सके।
प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया
प्रधानमंत्री Narendra Modi ने कहा कि भारत की विविधता उसकी सबसे बड़ी ताकत है और हर राज्य की भाषा, संस्कृति और परंपरा को सम्मान मिलना चाहिए। उन्होंने कहा, “भारत की एकता उसकी विविधता में निहित है। जब कोई राज्य अपनी भाषाई जड़ों से जुड़ने की पहल करता है, तो यह पूरे राष्ट्र के लिए गर्व का विषय होता है।”
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि भारतीय भाषाओं को सशक्त करना केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। नई शिक्षा नीति के तहत मातृभाषा में शिक्षा को बढ़ावा देने के प्रयासों का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति और सोच की अभिव्यक्ति है।
‘केरलम’ नाम का ऐतिहासिक महत्व
इतिहासकारों के अनुसार ‘केरलम’ शब्द प्राचीन साहित्य और शिलालेखों में मिलता है। मलयालम भाषा में राज्य को परंपरागत रूप से ‘केरलम’ ही कहा जाता है। अंग्रेजी और अन्य भाषाओं में समय के साथ इसका रूप ‘केरल’ हो गया।
साहित्यकारों का कहना है कि नाम में यह बदलाव राज्य की सांस्कृतिक पुनर्स्थापना की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह न केवल भाषा के सम्मान को दर्शाता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य भी करेगा।
संवाद में उठे अन्य मुद्दे
इस मुलाकात के दौरान मलयालम साहित्य के संवर्धन, क्षेत्रीय लेखकों को प्रोत्साहन और भारतीय भाषाओं के डिजिटलीकरण जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई। प्रतिनिधिमंडल ने सुझाव दिया कि मलयालम की क्लासिक रचनाओं का अधिकाधिक भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद किया जाए।
प्रधानमंत्री ने इस दिशा में हर संभव सहयोग का आश्वासन दिया और कहा कि डिजिटल इंडिया अभियान के माध्यम से क्षेत्रीय भाषाओं को नई तकनीक से जोड़ना समय की मांग है।
सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया
इस मुलाकात की तस्वीरें सामने आते ही सोशल मीडिया पर #Keralam और #MalayalamLanguage ट्रेंड करने लगे। कई प्रख्यात लेखकों और सांस्कृतिक हस्तियों ने इसे ऐतिहासिक क्षण बताया। लोगों ने इसे भाषाई सम्मान और सांस्कृतिक आत्मविश्वास की दिशा में सकारात्मक कदम करार दिया।
एक नई पहचान की ओर
विशेषज्ञों का मानना है कि ‘केरल’ से ‘केरलम’ नामकरण केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का संकेत है। यह उस भारत की तस्वीर पेश करता है, जहां हर भाषा और हर परंपरा को समान सम्मान मिलता है।
प्रधानमंत्री और मलयाली साहित्यकारों के बीच हुई यह मुलाकात इस बात का प्रमाण है कि संवाद और सहयोग के माध्यम से सांस्कृतिक मुद्दों का समाधान संभव है। ‘केरलम’ अब केवल एक नाम नहीं, बल्कि पहचान, गर्व और विरासत का प्रतीक बन चुका है।
