
एफसीआई का ‘हब एंड स्पोक’ साइलो प्रोजेक्ट: खाद्य सुरक्षा का आधुनिकीकरण या कॉरपोरेट केंद्रीकरण?
भारत में खाद्यान्न भंडारण की समस्या कोई नई नहीं है। हर साल लाखों टन गेहूं और चावल सरकारी गोदामों में जमा रहता है। लेकिन पुराने गोदाम, खुले में रखे अनाज, बारिश, नमी, कीटों और खराब प्रबंधन के कारण बड़ी मात्रा में खाद्यान्न खराब होने की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। इसी समस्या के समाधान के लिए भारतीय खाद्य निगम (FCI) ने देश की भंडारण व्यवस्था को आधुनिक बनाने की दिशा में एक महत्वाकांक्षी योजना शुरू की, जिसे “हब एंड स्पोक साइलो प्रोजेक्ट” नाम दिया गया।
क्या है हब एंड स्पोक साइलो परियोजना?
इस परियोजना का उद्देश्य आधुनिक स्टील साइलो बनाकर देश की खाद्यान्न भंडारण क्षमता को बढ़ाना था। शुरुआती चरण में लगभग 60 लाख मीट्रिक टन भंडारण क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा गया। बाद में सरकारी दस्तावेजों में 111.125 लाख मीट्रिक टन तक आधुनिक भंडारण क्षमता विकसित करने की योजना का उल्लेख भी सामने आया।
परियोजना को पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के तहत लागू किया गया। इसके अनुसार निजी कंपनियां साइलो का निर्माण करेंगी, उनका संचालन करेंगी और तय अवधि तक भंडारण सेवाएं उपलब्ध कराएंगी। हालांकि खाद्यान्न का स्वामित्व पूरी तरह सरकार और एफसीआई के पास ही रहेगा।
सरकार ने क्यों शुरू किया यह प्रोजेक्ट?
सरकार का तर्क था कि आधुनिक स्टील साइलो के माध्यम से खाद्यान्न को अधिक सुरक्षित रखा जा सकेगा। इससे खुले में बोरियों में अनाज रखने की आवश्यकता कम होगी, परिवहन व्यवस्था तेज होगी और खाद्यान्न खराब होने की घटनाओं में कमी आएगी। साथ ही खाद्य सुरक्षा प्रणाली को अधिक तकनीक आधारित और कुशल बनाया जा सकेगा।
शुरुआत में इस परियोजना को देश की खाद्य सुरक्षा प्रणाली में एक बड़े सुधार के रूप में देखा गया। लेकिन समय के साथ टेंडर प्रक्रिया और परियोजनाओं के वितरण को लेकर कई सवाल उठने लगे।
विवाद की शुरुआत: एंटी-मोनोपॉली क्लॉज
एफसीआई को पहले से अंदेशा था कि आधुनिक साइलो क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा करने वाली कंपनियों की संख्या सीमित है। इस क्षेत्र में भारी पूंजी निवेश, तकनीकी विशेषज्ञता और लंबे समय तक संचालन क्षमता की आवश्यकता होती है। ऐसे में कुछ बड़ी कंपनियों के प्रभुत्व की आशंका थी।
इसी वजह से एफसीआई ने शुरुआती टेंडर दस्तावेजों में एक “एंटी-मोनोपॉली क्लॉज” शामिल करने का प्रस्ताव रखा था। इसका उद्देश्य था कि कोई भी कंपनी सीमित संख्या से अधिक परियोजनाएं हासिल न कर सके। भले ही वह सबसे कम बोली लगाए, लेकिन एक निश्चित सीमा के बाद उसे अतिरिक्त प्रोजेक्ट नहीं दिए जाएंगे।
एफसीआई का मानना था कि खाद्य सुरक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में अत्यधिक केंद्रीकरण भविष्य में जोखिम पैदा कर सकता है।
2021 के बाद बदला पूरा ढांचा
दिसंबर 2021 में स्टैंडिंग फाइनेंस कमेटी की बैठकों में नीति आयोग और आर्थिक मामलों के विभाग (Department of Economic Affairs) ने परियोजना के ढांचे को लेकर महत्वपूर्ण सुझाव दिए।
इन सुझावों में छोटे-छोटे प्रोजेक्ट्स की बजाय बड़े “बंडल” तैयार करने की बात कही गई। इसका मतलब था कि कई साइलो और उनसे जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को एक साथ जोड़कर बड़े टेंडर पैकेज बनाए जाएं।
इस बदलाव के बाद कुछ टेंडर पैकेजों का मूल्य हजारों करोड़ रुपये तक पहुंच गया। कई मामलों में एक पैकेज की कीमत लगभग 3,900 करोड़ रुपये तक बताई गई।
आलोचकों का कहना है कि इतने बड़े पैकेज तैयार होने से छोटी और मध्यम कंपनियों के लिए प्रतिस्पर्धा करना लगभग असंभव हो गया। क्योंकि ऐसी परियोजनाओं में भाग लेने के लिए विशाल वित्तीय क्षमता, बैंक गारंटी और दीर्घकालिक निवेश की आवश्यकता थी।
हट गया एंटी-मोनोपॉली क्लॉज
2022 में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप अप्रेजल कमेटी (PPPAC) की बैठकों में एफसीआई द्वारा प्रस्तावित एंटी-मोनोपॉली शर्त पर चर्चा हुई।
रिपोर्टों के अनुसार, नीति आयोग ने इस क्लॉज पर आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि देश की कुल खाद्यान्न भंडारण क्षमता की तुलना में यह परियोजना अभी भी एक सीमित हिस्सा है, इसलिए एकाधिकार को लेकर चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।
आर्थिक मामलों के विभाग ने भी इसी तरह की राय दी और वित्तीय क्षमता को अधिक महत्व देने की सिफारिश की। इसके बाद एंटी-मोनोपॉली क्लॉज को हटा दिया गया।
यहीं से पूरे विवाद की दिशा बदल गई।
कैसे बढ़ा अदाणी समूह का दबदबा?
एंटी-मोनोपॉली शर्त हटने के बाद 2022 में DBFOOT (Design, Build, Finance, Own, Operate and Transfer) मॉडल के तहत नए टेंडर जारी किए गए।
इन टेंडरों में अदाणी एग्री लॉजिस्टिक्स लिमिटेड ने लगातार बड़ी संख्या में परियोजनाएं हासिल करनी शुरू कर दीं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, फेज-1 के दूसरे चरण में कंपनी ने लगभग सभी उपलब्ध टेंडर जीत लिए।
बताया जाता है कि फेज-1 की कुल 80 परियोजनाओं में से लगभग 70 परियोजनाएं अदाणी समूह को मिलीं। इनकी कुल अनुमानित कीमत करीब 9,713 करोड़ रुपये थी।
इतनी बड़ी संख्या में परियोजनाएं एक ही कंपनी को मिलने के बाद खाद्यान्न भंडारण जैसी राष्ट्रीय अवसंरचना परियोजना में कॉरपोरेट केंद्रीकरण को लेकर सवाल उठने लगे।
फेज-2 में सामने आया दूसरा बड़ा खिलाड़ी
परियोजना के दूसरे चरण में एक और निजी कंपनी तेजी से उभरकर सामने आई—लीप इंडिया फूड एंड लॉजिस्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड।
फेज-2 के दौरान कुल 48 परियोजनाओं में से लगभग 38 परियोजनाएं इस कंपनी को मिलीं। इन अनुबंधों का कुल मूल्य लगभग 6,173 करोड़ रुपये बताया गया।
इस तरह पहले चरण में अदाणी समूह और दूसरे चरण में लीप इंडिया को बड़ी संख्या में परियोजनाएं मिलने के बाद परियोजना की तस्वीर और स्पष्ट हो गई।
110 परियोजनाएं सिर्फ दो कंपनियों के पास
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, कुल 134 साइलो परियोजनाओं में से लगभग 110 परियोजनाएं अदाणी एग्री लॉजिस्टिक्स लिमिटेड और लीप इंडिया फूड एंड लॉजिस्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड को मिलीं।
इन परियोजनाओं का संयुक्त मूल्य 16,500 करोड़ रुपये से अधिक बताया जाता है। लगभग 60 लाख मीट्रिक टन आधुनिक भंडारण क्षमता में से करीब 46.5 लाख मीट्रिक टन क्षमता इन्हीं दो कंपनियों के नियंत्रण वाले साइलो नेटवर्क में होगी।
यहीं से “डुओपॉली” यानी दो कंपनियों के प्रभुत्व की चर्चा शुरू हुई।
हब एंड स्पोक मॉडल कैसे काम करता है?
इस मॉडल में एक बड़ा केंद्रीय साइलो “हब” के रूप में काम करता है, जबकि उससे जुड़े कई छोटे साइलो “स्पोक” कहलाते हैं।
रेल मार्ग के जरिए खाद्यान्न पहले बड़े हब तक पहुंचता है। वहां से उसे विभिन्न जिलों और क्षेत्रों के स्पोक साइलो तक भेजा जाता है। सरकार का दावा है कि इससे परिवहन लागत घटती है और वितरण प्रक्रिया तेज होती है।
लेकिन आलोचकों का कहना है कि जब एक ही कंपनी कई हब और स्पोक नेटवर्क का संचालन करती है, तो खाद्यान्न आपूर्ति श्रृंखला के बड़े हिस्से पर उसका प्रभाव बढ़ जाता है।
30 वर्षों तक संचालन का अधिकार
रिपोर्टों के अनुसार, कुछ परियोजनाओं में कंपनियों को लगभग 30 वर्षों तक संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी दी गई है।
इसका अर्थ है कि कंपनियां केवल साइलो का निर्माण ही नहीं करेंगी, बल्कि कई दशकों तक उनकी देखरेख और संचालन भी करेंगी।
इसी कारण कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ एक निर्माण परियोजना नहीं बल्कि दीर्घकालिक अवसंरचना नियंत्रण का मामला भी है।
सरकार और कंपनियों का पक्ष
अदाणी समूह ने कई अवसरों पर स्पष्ट किया है कि वह खाद्यान्न खरीदता नहीं है, खाद्य पदार्थों की कीमतें तय नहीं करता और न ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) का संचालन करता है।
कंपनी का कहना है कि उसकी भूमिका केवल आधुनिक साइलो अवसंरचना के निर्माण और संचालन तक सीमित है। खाद्यान्न का स्वामित्व, खरीद और वितरण पूरी तरह एफसीआई और केंद्र सरकार के नियंत्रण में रहता है।
सरकार का भी यही तर्क है कि देश की खाद्यान्न भंडारण व्यवस्था को आधुनिक बनाने के लिए बड़े निवेश और तकनीकी विशेषज्ञता की आवश्यकता थी। इसलिए सक्षम निजी कंपनियों को इसमें भाग लेने का अवसर दिया गया।
अब भी बने हुए हैं कई सवाल
हालांकि इस पूरे मामले में अब भी कई प्रश्न उठाए जा रहे हैं। यदि प्रतिस्पर्धा बनाए रखना ही उद्देश्य था, तो एंटी-मोनोपॉली क्लॉज क्यों हटाया गया? हजारों करोड़ रुपये के बड़े बंडल क्यों बनाए गए? ऐसी व्यवस्था क्यों तैयार की गई जिसमें मुख्य रूप से बड़ी वित्तीय क्षमता वाली कंपनियां ही प्रतिस्पर्धा कर सकें?
इन सवालों के स्पष्ट उत्तर अभी तक सामने नहीं आए हैं। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि अब तक किसी अदालत या सरकारी जांच एजेंसी ने इस टेंडर प्रक्रिया को अवैध घोषित नहीं किया है। न ही रिश्वत, टेंडर घोटाले या अवैध लाभ पहुंचाने के आरोप साबित हुए हैं।
निष्कर्ष
एफसीआई का हब एंड स्पोक साइलो प्रोजेक्ट भारत की खाद्यान्न भंडारण प्रणाली को आधुनिक बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जाता है। इससे खाद्यान्न की बर्बादी कम करने, परिवहन व्यवस्था सुधारने और भंडारण क्षमता बढ़ाने की उम्मीद की गई थी।
लेकिन टेंडर संरचना में बदलाव, एंटी-मोनोपॉली शर्त हटाए जाने और बड़ी संख्या में परियोजनाओं का सीमित कंपनियों को मिलना इस परियोजना को विवादों के केंद्र में ले आया।
आज भी बहस जारी है कि यह परियोजना भारत की खाद्य सुरक्षा प्रणाली को अधिक मजबूत बनाएगी या फिर सार्वजनिक अवसंरचना के बढ़ते कॉरपोरेट केंद्रीकरण का एक उदाहरण बनकर रहेगी।
