नई दिल्ली, भारत – सीबीएसई की तीन-भाषा नीति ने कक्षा 9 और 10 तक विस्तार के बाद व्यापक विवाद पैदा कर दिया है। इस नीति के अनुसार छात्रों को तीन भाषाएँ पढ़नी होंगी, जिनमें कम से कम दो भारतीय भाषाओं का चयन अनिवार्य होगा। इस निर्णय की जानकारी जाने के बाद विद्यार्थियों, अभिभावकों और विद्यालयों में असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई है।
राष्ट्रीय छात्र संगठन (NSUI) के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद जाखड़ सहित कई आलोचकों ने इस सर्कुलर का कड़ा विरोध किया है। उनका कहना है कि यह एक थोपने वाला निर्णय है जो बिना छात्रों, शिक्षकों या अभिभावकों की उचित राय लिए लिया गया है। वे इसके अचानक लागू होने से छात्रों पर शैक्षणिक दबाव और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका जता रहे हैं।
विशेष रूप से उन छात्रों की चिंता बढ़ी है जो पहले से ही अपनी तीसरी भाषा के रूप में फ्रेंच, जर्मन या स्पैनिश जैसी विदेशी भाषाएँ पढ़ रहे हैं। वे आशंकित हैं कि इस नई नीति के कारण उनके पाठ्यक्रम में क्या परिवर्तन होंगे और उनके भविष्य पर इसका क्या असर पड़ेगा।
शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों का भी मानना है कि नीति लागू करने का वक्त और तरीका उचित नहीं चुना गया है। इससे न केवल छात्रों के लिए बल्कि विद्यालय प्रशासन के लिए भी कई प्रकार की जटिलताएँ खड़ी हो रही हैं। विशेषज्ञों ने कहा कि नीति को अमल में लाने से पहले व्यापक विचार-विमर्श और स्पष्ट दिशा-निर्देश प्रदान करना आवश्यक था।
देश भर में इस नीति को लेकर चर्चा जारी है और कई प्रदेशों के विद्यालयों ने इसे लेकर अपनी समीक्षा शुरू कर दी है। अभिभावक संगठनों ने भी सरकार से आग्रह किया है कि वे छात्र हितों को ध्यान में रखते हुए इस नीति की समीक्षा करें और आवश्यक संशोधन करें।
सीबीएसई ने फिलहाल इस विवाद को देखते हुए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने का आश्वासन दिया है ताकि स्कूलों में भ्रम की स्थिति समाप्त की जा सके। इस बीच छात्रों और अभिभावकों द्वारा सोशल मीडिया और अन्य मंचों पर भी सहायक मार्गदर्शन की मांग तेज हो गई है।
इस पूरे विवाद ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था में भाषा नीति के महत्व और लागू करने के तरीकों पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। यह देखना होगा कि आने वाले समय में सीबीएसई इस चुनौतीपूर्ण स्थिति को कैसे संभालता है और छात्रों के हित में कौन से कदम उठाता है।
