पटना, बिहार – बिहार में 18वीं सदी की लगभग भूली हुई कला पटना कलम को पुनर्जीवित करने का प्रयास जोर पकड़ रहा है। यह कला शैलि मुगल मिनिएचर चित्रकला और यूरोपीय प्राकृतिकता के संयोजन से विकसित हुई थी, जिसने तत्कालीन भारत के सामरिक और सामाजिक जीवन की झलक प्रदान की।
पटना कलम की पहचान इसकी सूक्ष्मता, रंगों की गहराई और यथार्थवादी चित्रण में निहित होती है। इतिहासकारों और कला विशेषज्ञों का मानना है कि यह कला भारत के रोजमर्रा के जीवन को समृद्ध रूप से संपादित करती है। लेकिन औपनिवेशिक काल और आधुनिकता के दबाव में ये चित्रकला लगभग विलुप्त हो गई थी।
हालांकि, अब बिहार सरकार और कई गैर सरकारी संगठन इस कला को पुनर्जीवित करने एवं संरक्षण के लिए प्रयासरत हैं। स्थानीय स्कूलों और प्रशिक्षण केंद्रों में छात्र इस कला के जटिल तकनीकों को सीख रहे हैं, जिससे नई पीढ़ी में इसके प्रति जागरूकता बढ़ रही है।
कला विशेषज्ञ डॉ. संजय कुमार के अनुसार, “पटना कलम केवल एक चित्रकला शैली नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत की कहानी है। इसे वापस लाई जाने का मतलब हमारी संस्कृति को पुनः जीवित करना है।” बिहार में आयोजित हुई कला प्रदर्शनी और कार्यशालाओं ने भी जनता में इस कला को समझने और सराहने की भावना जागृत की है।
सरकारी स्तर पर, कला के संरक्षण के लिए फंडिंग बढ़ाई जा रही है और शोध कार्यों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। साथ ही पर्यटन विकास में भी पटना कलम को एक विशेष पहचाना देने की योजना बनाई गई है। इससे न केवल कलाकारों को रोजगार मिलेगा, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक पहचान को भी एक नई ऊंचाई मिलेगी।
पटना कलम पुनरुद्धार की यह पहल न केवल कला प्रेमियों के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह समूचे भारत के सांस्कृतिक इतिहास में एक नई संजीवनी की तरह काम करेगी। यह कला हमारी जड़ों से लगातार जुड़ी हुई है और आज के दौर में इसकी वापसी एक बड़े सांस्कृतिक पुनर्जागरण का संकेत है।
