दिल्ली, दिल्ली
पं. चतुर लाल के जन्म शताब्दी के अवसर पर दिल्ली के सफदरजंग की समाधि पर एक भव्य समारोह का आयोजन किया गया, जिसमें न केवल उनकी संक्षिप्त लेकिन उज्ज्वल जीवन यात्रा का सम्मान किया गया, बल्कि उनकी संगीत प्रतिभा को भी श्रद्धांजलि दी गई। यह अवसर संगीत प्रेमियों और विश्वसंगीत के जानकारों के लिए एक यादगार पल साबित हुआ।
पं. चतुर लाल का नाम तबले के क्षेत्र में जन-जन के दिलों में अमिट छाप छोड़ने वाले कलाकारों में गिना जाता है। उन्होंने न केवल भारतीय संगीत को उच्चतम शिखर तक पहुंचाया, बल्कि तबले की मधुरता और विविधता को भी दुनियाभर में फैलाया। समारोह में विभिन्न प्रसिद्ध संगीतकारों और विद्वानों ने उनकी प्रतिभा और योगदान पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि ने कहा कि पं. चतुर लाल ने भारतीय तबला वादन की एक नई पहचान बनाई, जिसने विश्व स्तर पर भारतीय शास्त्रीय संगीत की प्रतिष्ठा बढ़ाई। उन्होंने तबले को सिर्फ एक वाद्ययंत्र नहीं बल्कि एक जीवंत कला के रूप में स्थापित किया।
इस अवसर पर उनके शिष्य कलाकारों ने उनके यादगार संवादों और शिक्षाओं को साझा किया, जिनसे स्पष्ट था कि पं. चतुर लाल ने संगीत को कितना गंभीरता से लिया और इसके प्रति उनकी लगन कैसी थी। आयोजकों ने उनकी विरासत को संजोते हुए आने वाले युवा कलाकारों के लिए विभिन्न वर्कशॉप्स और संस्कार कार्यक्रम भी आयोजित करने का फैसला किया है।
सफदरजंग की समाधि पर आयोजित यह समारोह संगीत के प्रति उनके प्रेम और समर्पण की मिसाल पेश करता है और इस बात का प्रमाण है कि उनकी छवि आज भी संगीत के क्षेत्र में सदाबहार बनी हुई है। भारतीय संगीत जगत के लिए यह एक गर्व का क्षण है कि पं. चतुर लाल जैसे महान कलाकारों का सम्मान इस प्रकार व्यापक स्तर पर किया गया।
इस भव्य आयोजन ने न केवल पं. चतुर लाल की यादों को ताजा किया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित किया कि वे संगीत के इस क्षेत्र में अपने योगदान से विश्व में भारत की धाक जमा सकें। पं. चतुर लाल के जीवन और कला की गूँज आज भी लोगों के दिलों में आवाज उठाती है।
